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“कल क्या बनेगा” ये है देश की महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या

यूं तो समाचार पत्र पत्रिकाएँ, चैनल, मीडिया में देश-विदेश की तमाम ज्वलंत समस्याओं पर चर्चा की जाती है| बहस भी धुआँधार होती है| लेकिन इसमे महिलाओं को कोई शांति नहीं मिलती, उल्टे उनका ब्लड प्रैसर और बढ़ जाता है क्योंकि उनकी खुद की समस्या ही इतनी हाई वोल्टेज वाली होती है| कि उसके ही झटकों से वो रोज हलकान होती रहती है| और सुर्ख़ियों में कोई भी उनकी इस समस्या का समाधान नहीं करता, फिर क्या हर रोज उससे लड़ना, जूझना और तमाम भावनात्मक तनाव से सिकुड़ना उनकी दिनचर्या ही बन जाती है|

देश ही नहीं, विदेशों में भी महिलाओं कि सबसे बड़ी समस्या बस यही रहती है कि कल क्या बनाना है? पुरुषों को तो देखने में तो यही लगता है, वाहयात ये भी कोई प्रॉब्लम है| जो रुचिकर लगे वो बना लो इसमें इतनी माथापच्ची का क्या काम है| ये कोई शतरंज का खेल थोड़े ही है जो इसमें इतना भेजा फ्राई किया जाए| जनाब सही कह रहे हो क्योंकि मर्दों को तो कुछ बनाना नहीं पड़ता, केवल खाये और ऑफिस या दुकान खिसके|

ये तो बनाने वाली महारानी से पूछो बरसों तक “कल क्या बनेगा” को हैंडल करते-करते, बुढ़ापे तक पहुँचते- पहुँचते उनके जैसी तमाम महिलाओं को थाइराइड, मोटापा,पथरी,बीपी हाई, शुगर जैसी नाना प्रकार की बीमारियाँ हो जाती हैं| मगर कमबख्त बुढ़ापे में भी ये सवाल पीछा नहीं छोड़ता| और इस सवाल को ट्रान्सफर कर दिया जाता है बेटी या बहू के पल्ले में | फिर वो इसे खानदानी विरासत की तरह बर्दाश्त करने लगती हैं|

रोज़ रोज़ की किच-किच से ग्रस्त होने लगती हैं| हालांकि इससे इतनी परेशानी न हो यदि इस देश में “सादा जीवन उच्च विचार और पौष्टिक भोजन ले लो शरीरानुसार” जैसे नियमों का पालन किया जाता हो| मगर मेरा देश बदल रहा है, भले ही स्लोली-स्लोली बदल रहा है| जो लोग सादा खाना खाने के शौकीन थे वो खुद अंडे की हाफ फ्राई खाने के मुहाने तक आ गए हैं| और जिनका सफर आमलेट तक ही रहता था वो पक्के नाँनवेज हो गए| जो महिलाएं पहले घर में जो बनता था उसमें ही संतुष्ट रहती थी, वो यूट्यूब पर खाने की वैराइटी देखकर उनके मुँह में हर वक़्त पानी भरने लगा|

जो बुढ्ढे-बुढ़ियां घर में लौकी, दलिया, खिचड़ी, खाकर भजन करते थे, उनके मन में भी अब कॉटीनेंटल फूड और चाउमीन, पाउभाजी का स्वाद बिलबिलाने लगे हैं| उसके लिए वो भी कतई अगले जन्म का इंतजार करने को राजी नहीं हैं| इधर वो भोले से प्यारे बच्चे जो दूध पीकर पारले जी का बिस्कुट खाकर मुँह पोंछ कर हाथ नेकर से साफ करते थे, वो इतने बदल गए कि उनकी माताएं बी.पी. की जीती जागती रोबोट बनी जा रही हैं| आज-कल के ये बच्चे अब इतने भोले नहीं रह गए हैं|

गोल-गोल गाल वाले अब्बल दर्जे के चटोरे हो गए हैं कि इनसे पूरा घर परेशान रहता है, फिर भी इनकी मनमानी सहता है| ये बच्चे अब पूरे घर का मीनू तय करते हैं, और अपनी माँ को शेफ बनने को मजबूर कर रहे हैं| इन बच्चो के चटोरेपन के कारण इंडिया में खाने पीने की चीजों की बड़ी बड़ी कंपनियों के रोजगार चल रहे हैं| बिस्कुट, टॉफी, मैगी, चॉकलेट, पास्ता, आइसक्रीम, कोल्डड्रिंक, मैकडॉनल्ड, मोमोज, पेटीज, पेस्ट्री, की तमाम कंपनियां चांदी काट रही हैं| दुनियाँ की सबसे बड़ी मार्केट इंडिया यूं ही नहीं बन गयी है| इसके पीछे इन भोले-भाले चटोरों की एक बड़ी होती आबादी है| जिसके आगे सब नतमस्तक हैं| इनकी मनमानी और चटोरी जीभ के कारण बड़ी-बड़ी शादियों के मीनू ही बदल गए हैं|

जिस शादी में पेटीज, पेस्ट्री, चाऊमीन, चॉकलेट, आइसक्रीम न हो, तो वो शादी बच्चों की नजर मे थर्ड क्लास होती है| या वो शादी ही नहीं मानी जाती| न ही कोई पार्टी या इवेंट इन बच्चों के आइटम के बिना पूरी होती है| बच्चों को भी ऐसी हवा लग गयी है कि छोटे-छोटे बच्चे भी अपना जन्मदिन रेस्टोरेंटों में मनाने लगे हैं| जिससे कुछ नया खाने को मिल जाये, या घर के बोरिंग खाने से दूर चटपटा भोजन का आनंद लिया जाए, जिससे उनका भी स्टेटस कुछ ऊंचा हो जाए | बच्चों की बदलती फूड आदत ने नयी-नयी समस्याओं को जन्म दे दिया है| जैसे मोटापे का कुपोषण | ये भला क्या हुआ आप कहेंगे| तो ये हुआ फास्टफूड खाया बच्चा मोटा हो गया, लेकिन उसकी बॉडी मे खून की कमी है| प्रोटीन और कैल्शियम की कमी है|

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