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कोचिंग जा रहे बच्चों पर जरा एक नजर बनाये रखें वरना हो सकता है बहुत कुछ….

देश में शिक्षा अपनी बुरी दुर्दशात्मक स्थिति से गुजर रही है| जिसका परिणाम कोचिंग क्लासों की बाढ़ के रूप में चारों ओर नजर आ रहा है| जब कोर्स ही जरूरत से ज्यादा हो, और स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई का स्तर कहलाने लायक न हो तो अभिभावकों को अपने बच्चों को ट्यूशन के लिए कोचिंग क्लासों में भेजना विवशता बन जाती है| वरना बच्चों का पास होना या अधिकतम अंक लाना ही मुश्किल हो जाता है| इसका जोखिम लेने को कोई भी तैयार नहीं होता| अलग से घर बुलवाकर ट्यूशन पढ़वाना इतना महंगा पड़ता है, कि हर कोई उसका खर्चा वहन करने की स्थिति में नही होता|

मैथ और साइंस ये दो ऐसे जटिल विषय हैं जिनके लिए बच्चों को कोचिंग दिलानी ही पड़ती है| और जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने का वक़्त आता है, तो कोचिंग अनिवार्य ही हो जाती है| आठवीं क्लास से ही बच्चे कोचिंग जाने लगते हैं| और वे इस कदर मानसिक दबाव में होते हैं| जिसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल होता है| पूरे हिंदुस्तान में पढ़ने वाले बच्चों की एक जैसी ही दिनचर्या होती है| सुबह 7 से 2 या 2:30 तक का समय उनका स्कूल में ही गुजरता है| 3 बजे तक घर पहुँचते हैं फिर भोजन से फ्री होकर 4 बजे कोचिंग को भागते हैं|

जहाँ से दो या तीन विषयों की कोचिंग क्लास के बाद 6 बजे घर पहुँचते हैं, फिर अपना होमवर्क, कोचिंगवर्क के नाम पर 5 घंटे का ही समय ही मिल पाता है| जिसमें उन्हें पेरेंट्स की डांट, मनपसंद टीवी प्रोग्राम देखना, डिनर करना भी शामिल होता है| इसमें उन्हें खुद के रिलेक्स होने का तो समय ही नहीं मिल पाता| न ही गहराई से स्टडी करने का टाइम मिल पाता है| कोचिंग वालों के भी तमाम लफड़े है| अभिभावकों को पता लगाना भी आसान नहीं होता कि कौन टीचर अच्छा पढ़ाता है, या फिर केवल पैसा बनाने के नाम पर मूर्ख बनाता है| जैसे-तैसे वो सही कोचिंग चुन पाते हैं| तो कई बार कोचिंग समझ न आने पर बार- बार बदलनी भी पड़ती है|

यहाँ तक तो सब ठीक है| कोचिंग जाने के लिए अधिकतर बच्चे स्कूटी या मोटर साइकिल ले जाते हैं| साईकिल पर जाने में उन्हें स्टेटस गिरने की चिंता सताती है| और अभिभावक भी लाड़ प्यार के चलते उन्हें स्कूटी या मोटरसाइकिल ख़ुशी- ख़ुशी दिला देते हैं| जबकि बच्चों के लिए साइकिल बेहतर साबित होती है| इस बहाने उनकी कुछ एक्सरसाइज भी हो जाती है| और सड़क दुर्घटनाओं का डर भी कम रहता है| बच्चे कोचिंग जाते वक़्त कई रोड दुर्घटनाओं में जान भी गँवा चुके हैं| जिसका एक बड़ा कारण जोश में होश खोना है| वे बाइक्स को अंधाधुंध भगाते हैं, आपस में रेस लगाते हैं| फिल्म स्टारों की तरह स्टंट करके धाक जमाने की कोशिश में लगे रहते हैं| पेरेंट्स को बच्चों को केवल साइकिल ही देनी चाहिए|

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