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खुल जा सिम-सिम की तरह वृध्दाश्रम खुलने का समय चल रहा है

श्रवण कुमार की यशो गाथाओं वाले देश में जिस तरह से  वृध्दाश्रम खुलते जा रहे हैं| वो बात कुछ हैरान और परेशान करने वाली है| कहीं न कहीं इस समस्या के पीछे वो तमाम मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हुए हैं| जो शायद लोगों की नजरों से कहीं दूर हैं| ये समस्या पूरे सामाजिक ताने-बाने के टूटकर बिखरने की शुरूआती दौर की लगती है| जिसके भविष्य में और तेजी आने की संभावनाएं हैं| आश्चर्य की बात ये भी है| कि ये समस्या गरीब परिवारों के मुकाबले मध्यम वर्ग के परिवारों में कहीं अधिक दिखाई दे रही है| कहीं-कहीं उच्च मध्यम वर्ग में भी इसकी उपस्थिति देखी जाती है|

जहाँ तक दृष्टि डालते हैं वहां तक ये समस्या भौतिकवादी संस्कृति के रुझान के चलते है| जिसमें मैं और मेरे के लिए ही जगह बचती है| वाकी लोग तो दूसरी दुनिया के समझे जाते हैं| वृध्दाश्रमों के बुजर्गों से संवाद करने के बाद पता चला कि परिवार में आर्थिक संकट जैसी भी कोई समस्या न होने के बावजूद भी बुजुर्गों को उनके बेटों ने घर से निकाल दिया और उन्हें मजबूरी में विवश होकर आश्रम में जाना पड़ता है| इस तरह के मामलों में परिवार की रार सबसे ज्यादा निकल आई| जिसके पीछे भी तमाम कारण थे| विदेशों में तो परिवार नाम की ये संस्था बुरी तरह से बिखरने की स्थिति में पहुँच चुकी है|

वहां काफी संख्या में ओल्ड एज होम खुले हुए हैं| अब यही स्थिति भारत में भी अपने शुरूआती दौर में ही दिखाई देने लगी है| इसके पीछे संस्कारों की कमी ही एक अकेला कारण नहीं है| बल्कि बदल रहे सामाजिक परिवर्तन भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं| माता-पिता जब अपने बच्चों को अपने काम धंधे (पुश्तैनी व्यवसाय) में नियोजित करके उनकी शादी के दायित्व से मुक्त हो रहे होते हैं| तब उन्हें इस बात का अनुमान नहीं होता कि लाइफ अब टर्निंग मोड़ पर आने वाली है| कई परिवारों से बात करने पर ये ज्ञात हुआ कि परिवार में लड़कों की बहु आने के बाद से ही रार होनी शुरू हो जाती है|

जैसे ही नयी बहु परिवार में कदम रखती है उसके बाद वो सयुंक्त परिवार से अलग होने की कवायद में ही लग जाती है| और अपना एकल परिवार बनाकर रहना चाहती हैं जहाँ वो सास-ससुर की हस्तक्षेप और बंदिशों से मुक्त होकर रह सके| इसके पीछे भी कई कारण छिपे रहते हैं| सयुंक्त परिवार में उन्हें लगता है| कि वो पुरानी परम्पराओं को ढ़ोने में विवश हैं| चाहे वो परम्परा के वर्तमान परिवेश में कोई मायने हों या न हों| दूसरा उन्हें अपनी शिक्षा का उपयोग करने की स्वंत्रता नहीं मिलती| तीसरा सयुंक्त परिवार में उन्हें काम ज्यादा करना पड़ता है|

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