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रंग भेद का समर्थन करने में दुनिया के किसी भी देश से आगे है भारत

अभी कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर क्रीमवॉर या कहें  नस्लीयवॉर चल रही थी| इसके खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले कोई और नहीं बल्कि फिल्मी जगत के ही एक सितारे अभय देओल आगे आये| भले ही उनका कैरियर सही नहीं चल रहा हो लेकिन उनके अभिनय क्षमता पर सवाल नहीं उठाये जा सकते| फेयरनेस क्रीम पर विवाद चल रहा था| उसमें धीरे-धीरे लोग कूदने भी लगे| जिनमें से सोनम कपूर का नाम है वो अभय देओल को ट्रोल करने के चक्कर में खुद ही फंस गयी थीं| और सोशल मीडिया के यूजर्स ने उन्हें ही ट्रोल कर डाला तो घबराकर सोनम ने अपने ट्वीट खुद ही डिलीट कर दिए|

अभय देओल ने बॉलीवुड़ एक्टर्स की फेयरनेस क्रीम एंडोर्स करने की वजह से जमकर आलोचना की थी| अभय ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर कई स्टारों पर निशाना साधा| उनमें से शाहरुख़खान, दीपिका, सोनमकपूर, शाहिदकपूर हैं| अभय ने लिखा था फेयरनेस क्रीम के एड बिना सोचे समझे करते हैं और कुछ भी दावा करते रहते हैं| बल्कि ये आईडिया बेचते हैं| कि गोरा रंग काले रंग से बेहतर है| इन कंपनियों के टॉप पर बैठे कोई अधिकारी आपको यह नहीं बतायेंगे कि यह सब गलत और नस्लीय है| अभय ने लोगों से कहा है कि आप लोगों को इस आईडिया को स्वीकार करना बंद कर देना चाहिए| कि किसी एक प्रकार की त्वचा दूसरी से बेहतर है|

दुर्भाग्य कि बात है कि अगर आप मैट्रीमोनियल साइट्स पर भी देखेंगे तो किसी के शरीर की बनावट और रंग के बारे में किस तरह से बताया जाता है| किसी कि त्वचा के रंग को बताने के लिए डस्क शब्द का प्रयोग किया जाता है| अभय ने फेसबुक बॉल पर कई तस्वीरें शेयर की जिनमें अलग-अलग कलाकार फेयरनेस क्रीम के अलग-अलग प्रोडक्ट्स के लिए मॉडलिंग कर रहे हैं| डस्क का मतलब होता है, ढ़लती शाम, उसे लोग किसी की त्वचा का रंग बताते हैं| हमारी सोच किस कदर रंग भेदी है| इसका पता चलता है| बड़े-बड़े ब्रांड अपना धंधा चमकाने के लिए निरा झूठ का मायाजाल फैलाते हैं|

उसके लिए गोरे-चिट्टे दिखने वाले हीरो-हीरोइन से उनका विज्ञापन करवाते हैं| जो ये लोगों को भरोसा दिलाते हैं कि सितारों का गोरापन इन क्रीमों कि ही देन है| इस देश में अलग-अलग कलर की स्किन के लोग रहते हैं| जहाँ ऋषि-मुनियों और आध्यात्मिक पुरुषों ने हमेशा ही योग्यता को महत्व दिया है| न कि रंग-रूप को| बल्कि रंग-रूप आदि पर ज्यादा ध्यान देने पर लोगों को लताड़ा गया है| व्यक्ति की आत्मा को ही महत्व दिया गया है| सभी में उसी ईश्वर को संभावित माना और समझा गया है| लेकिन लोगों के मन उच्च स्तरीय विचारों और ज्ञान को कभी आत्मसात ही नहीं कर पाए|

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